Friday, January 8

कविता


कविता बनती है बातों-बातों में
ख़यालों में, जज्बातों में

कविता टूटे दिलों का दर्पण है
प्रियतमा के लिए प्रेम, समर्पण है
प्रेम की पहली पाती है
अनुभव की आंच है, सृष्टि है
कविता ऊसर हृदय पर प्रेम की वृष्टि है


कविता आप बीती है
हँसती है, कभी रोती है
मां के लिए लोरी है
बच्चों के लिए ज्ञान की तिजोरी है
कविता, अनाथ के लिए मां है
जो बूझे उसके लिए सारा जहां है


कविता आईना है समाज का
इतिहास है आज का
विश्व, राष्ट्र, स्वराज का
कविता आज की तस्वीर है
कल की जागीर है 


कविता सुनहरा ख्वाब है, लिखने की ललक है
विचारों की दुनिया में उड़ने के लिए फ़लक है
सुबह की पहली अंगड़ाई है
पिता का संघर्ष, मां की लड़ाई है
बेटियों के लिए आज़ादी है, नाम है
कविता ज़ेहन में विचारों का संग्राम है


कविता भाव, अभाव, शक्ति के प्रभाव में
एक सृजन है, आने वाली बहार है
गीत है, संगीत है, सृष्टि का श्रृंगार है
जीवन-मरण का साथ है
इंसाफ की आस है
कविता, कभी न बुझने वाली प्यास है
                    
                        सुनील राऊत

Thursday, January 7

व्यापम घोटाले पर एक कविता- मामा किस-किस से मांगेंगे माफी ?

देश का दिल देखने वालों का दिल इन दिनों बैठा जा रहा है
न जाने कौन सा लाइलाज मर्ज मौत बांट रहा है

नेताजी की नातिन, बाबू का बेटा, साहबज़ादा
सबने बांट लिया है ज्यादा-ज्यादा

इस बंदरबाट में जिनका हुआ नुकसान
उनके लिए इस 'पाप' को भूल पाना नहीं है आसान

पूंजी के सहारे मूढ़ों ने किया कमाल
बेरोजगार ही मर रहे हैं ग़रीबों के लाल

मौतौं की माला पर मंत्री जी ने शाश्वत सत्य गान गाया है
किसी नेता को इस कांड पर अफसोस नहीं आया है

कांड की गुत्थी सुलझाने अब सीबीआई को बुलाया है
लंबे वक्त बाद मुखिया मामा ने खुद को राहत में पाया है

राहत मगर न मिल पाई उन काबिल नौजवानों को
रात-दिन एक कर जो पाल रहे थे अरमानों को

लाखों अरमानों का क़त्ल किया है नेता, अफसर, दलालों ने
भ्रष्ट व्यवस्था को जन्म दिया है उनकी नापाक चालों ने

भले आप हो सच्चे फिर भी हैं अब शक की नज़रों में
नहीं बची है अब प्रशंसा मानस के अधरों में

तुमने लूटा, सबने लूटा, लूट लिया नवपीढ़ी को
सपनें टूटें, कुचल दिया अरमानों की सीढ़ी को

हर देहरी पर लूट मची है, मचा रखी है काफी
'मामा' किस-किस से मांगेंगे माफी, किस-किस से माफी
                                               सुनील राऊत

 

चंद लाइनें...

ईमान की दुकानें सज रही हैं,
वफ़ा बाज़ारों में बिक रही है
सरोकार सस्ते हो गए हैं सियासी दुनिया में
लोग अब बेवजह बिक रहे हैं।
                       सुनील राऊत


नाउम्मीदी के अंधेरों में, भरोसे का भरम छोड़ दे
दगा के दरख्त पनपने लगे हैं दोस्ती की दीवारों के बीच
                        सुनील राऊत


एक नाम की चाह में बदनाम हो गए
तमन्ना थी मशहूरी, ग़ुमनाम हो गए

भीड़ का बादशाही का दौर गुज़र गया
अब क़िस्सों-कहानी के किरदार हो गए
                          सुनील राऊत


नववर्ष ऐसा हो...

खुशियां बांटें, उमंगों के गीत गाएं
इस नववर्ष,
अपनों को अपना बनाएं

मदद का हाथ बढ़ाएं
बाहें खोलें
आओ दिल से दिल मिलाएं
मज़हब की दीवारों को फांदकर
इस नववर्ष,
इंसां को इंसान बनाएं

ऊंच-नीच का तिमिर मिटाएं
स्नेह की लौ से
समता का दिया जलाएं
भूल कटुता, घृणा की राजनीति
इस नववर्ष,
एक नया जहां बनाएं

नारी को औरत ना समझें
सम्मान दें
मां, बहन, बेटी बनाएं
मन के रावण का वध करके
इस नववर्ष,
मर्यादा पुरुषोत्तम बनें

सिले होठों को फिर से खोलें
खुलकर बोलें
मन-मस्तिक्ष पर जमी काई हटाएं
ट्विटर, एसएमएस, वाट्सएप्प छोड़ें
इस नववर्ष,
दिल से दिल के तार मिलाएं

बदला त्यागकर बदलाव लाएं
पुरातन सोच में
आधुनिकता का तड़का लगाएं
इंग्लिश-नवसंवत्सर का बैर भुलाकर
इस नववर्ष,
पूरब-पश्चिम का मेल कराएं

खुशियां बांटें, उमंगों के गीत गाएं
इस नववर्ष,
अपनों को अपना बनाएं
                        सुनील  राऊत












Wednesday, January 6

बेवजह दिल आज भारी है...

बेवजह दिल आज भारी है
ज़िन्दगी से जंग जारी है 

कलम कांप रही है हाल-ए-दौर लिखने में
हर हाथ तलवार, कटारी है 

ज़हर भरा है ज़ेहन-ज़ेहन में
कांटों की बगिया में फूलों की क्यारी है

मज़हबी ताप से कसुम कुम्हलाए
प्रेम की गर्दन, नफरत की आरी है

भूखा वनमृग दौड़ रहा है 
ताक में बैठा शिकारी है

अनभिज्ञ हिरण को क्या मालूम 
आज करनी मृत्यू की सवारी है
बहन-बेटियां लुट रही है 
हर्षित मदमस्त व्यभिचारी हैं

मात-पिता रुदन कर रहे
हुए कठोर बनवारी हैं

रावण यहां आज भी पूजनीय 
सीता, अहिल्या दण्ड की अधिकारी हैं

काम की बच्चे मांगते हैं घूस
अब हर घर लगे कचहरी है

मां भी लगने लगी बेगानी
बेटा हो गया शहरी है

धीरे-धीरे रिश्तों की कतरन  
लगने लगी अब गठरी है

पापा डैडी, मां हैं मम्मी 
दादा,दादी बीमारी है

इतिहास हो गए हैं सुदामा
व्यापार बन गई यारी है


बेवजह दिल आज भारी है
ज़िन्दगी से जंग जारी है
              ...सुनील राऊत

किसी महानुभव से मुलाक़ात के बाद मिली प्रेरणा... साथ चलों


साथ चलो, राहें बनेगी मिलेंगी मंजिलें
ख़ुदी के वास्ते क़दम उठाकर तो देखो

कांटों के ठिकानों, इरादों से वाक़िफ़ हूं बख़ूबी
नंगे पांव चलने वालों के तजुर्बे पढ़े हैं मैंने

हाथों की लकीरों में मशरूफ़ रहने वालो
बिना हाथ क़ामयाबी लिखने वालों से भी तो मिलो

मिलो उनसे, जो चले हैं मीलो मिलकर मयखाने की तलाश में
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर की बंटी राहों को क्यों तलाशें  

तलाशों उनको, जिन्हें हो तलाश तुम्हारी
अपनी तलाश में भी कभी निकलकर देखो

देखो उन्हें जिनकी दिखाई राहों से हमने ज़माने देखे
देखा-देखी को हुनर मानने वालों से भी तो मिलो
 
साथ चलो, राहें बनेगी मिलेंगी मंजीलें
ख़ुदी के वास्ते क़दम उठाकर तो देखो
                      .... सुनील राऊत

पं. रमेश बाकरे (बाबूजी) को श्रद्धांजलि...

बाबूजी...
जिनके सुर में सागर की गहराई
तान हृदय के पार उतरती
शब्द-शब्द संगीत हैं जिनके
वाणी पर विणापानी

नस-नस में नाद् है बहता
श्वास सुर से चलती
चलना भी एक ताल हो जिनका
नतमस्तक हो ज्ञानी

अधरों पर मुस्कान मनोहर
मुख पर संतोष की आभा
मन कोमल, तन से सबल
हर पग हितकरणी

ऊसर को उर्वरा बना दे
जड़ हो जाए चेतन
कष्टों को आनंद में बदले
ऐसी अलौकिक तरणी

जिनके सुर संतों को प्यारे
गुरु भी जिनके आगे हारे
जब वे अदभुत तान छेड़ दे
निद्रा भुले यामिनी

एक ध्येय संगीत की सेवा
चाहा न कभी जीवन से मेवा
जीवन ओरों के सुख में लगाए
ऐसे थे वे दानी

धन्य हो गई एक पीढ़ी
धन्य हो गया गांव
रौशन हुआ कुल का भी नाम
सदा रहेंगे मुकुटमणी
बाबूजी सदा रहेंगे मुकुटमणी...
सुनील राऊत